विमुद्रीकरण: एक साला का लेखा जोखा

तो क्या सवा करोड़ भारतवासी निकल गए अमरीका से आगे? क्या बन गए हम सबसे बड़ी ताक़त?
क्या ४ महीने तक जो हमने झेला उसके परिणाम मिल गए? क्या आपके बैंक में आ गए १५ लाख रुपैये?
भाई मेरे तो नहीं आये, किसी के आये हों तो बड़े कमान में रिपोर्ट कर दीजियेगा, शायद गुजरात चुनाव में ज़रुरत पड़े!

कितना भी कह लें, विमुद्रीकरण से अगर कोई फ़ायदा हुआ है तो वो या तो साहब जानते हैं या उनके भक्त।
आम आदमी बेचारा लाइन में लग लग कर पस्त हो गया, ATM की लाइन बढ़ती गयी, नोटों की गिनती अगर हुई तो सिर्फ मंत्रियों के यहाँ!
पर परेशान कौन हुआ?
हमारा अन्नदाता किसान!
और क्या बयाँ किया जाये? न मिल समय पर पैसा देती है, न सरकार कुछ मदद करती है, सिर्फ मुआवज़ों के नाम पर भयंकर रैलियाँ, तालियाँ, तमाशे और वाह वाही बटोरने की कला भली भांति जानती है। और अंत में मिलता क्या है? बाबाजी का ठुल्लू!
उत्तर प्रदेश में मथुरा, बुंदेलखंड में चेक में पैसों में राशि जाना, केरला में रबर और केला की पैदावार करने वाले किसानों को अच्छा पैसा न मिलना, महाराष्ट्र में तो किसानों का दुर्भाग्य है की प्रकृति और सरकार दोनों उनके साथ मज़ाक करते हैं, उड़ीसा में किसान आत्म हैं, कर्णाटक में, तमिल नाडु में किसान आत्महत्या करने पर उतारू है, राजस्थान में ज़बरदस्ती किसानों से ज़मीन छीनी जा रही है! हर राज्य में कुछ न कुछ।
इसका जवाब कौन देगा?

आपका,
शेखर दीक्षित

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