34!!!

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जी हाँ , ये ताज़ा आंकड़ा है एक सर्वे के अनुसार जिस में ये पाया गया है की हर रोज़ लग भाग 34 किसान रोज़ आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं!
वाह भैया, क्या विकास है, क्या प्रगति है और क्या जीडीपी!
जहाँ एक तरफ सीना ठोक कर कहते हैं की भारत एक कृषि अर्थव्यवस्था है, वहीँ उसके करता धर्ता की कितनी इज़्ज़त है, ये भी पता चल गया।
कभी महाराष्ट्र में, कभी तमिल नाडु में, कभी उड़ीसा में, कभी सूखे से, कभी बाढ़ से, कभी कीटों से और सबसे बड़ा कारण- क़र्ज़ से सब किसान परेशांन हैं और अपनी ही जान खुद लेने पर मजबूर हैं।
योजनाएं बनाने, रिपोर्ट बनाने, मीटिंग करने में पैसा खर्च करने से फुर्सत मिले तो कोई इनकी सोचे ना!
और सबसे गलत बात- मुआवज़े के नाम पर तालियां बटोरना और जब देने की बात आये तो मज़ाक के चेक भेज देना। शर्म आती है ऐसी सरकार पर, गुस्सा तो दूर की बात है।
हमारी तो यही कोशिश है की हम किसान भाइयों की ज़्यादा से ज़्यादा मदद करें। आप साथ जुड़ेंगे तो बात और बनेगी।

आपका,
शेखर दीक्षित

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